मियांबीबी दो झगड़ते थे भारी
सोंचा सुलह करवा देगें हम सारी
फंस गये मियांबीबी दोनो को झेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
घुसे थे भीड़ में लाटरी का चक्कर
पर हो गई जेबकतरे से टक्कर
बची अठन्नी ना रहा ना धेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
चढ़ गये स्टेज पर माइक हमने लेली
सोंचा कविता देगी रुपयों की थेली
भर गया फेंकी हुई चप्पल का थेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
चुनाव मे सिर दिया मेहनत से जुटे
विरोधि कमबख्त ले चाकू टूटे
लौट के बुद्धु घर आने की वेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
इंटरनेट पर हिरो होने का दावा
चट आगया ऐर्श्वया का बुलावा
उसकी आयु सनसठ हुआ झमेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
एकला चलो रे की आदत जो छुटी
लुटे और पिट गये किस्मत ही फूटी
अब तो बन जा तू टेगोर का चेला
दुनियां का मेला चल तू अकेला
-हरिहर झा
मौत से आंखमिचोली
कारगील हो या गेलीपोली
जंग की शतरंज का वादा
कोई वजीर ना प्यादा
सीने मे लगती जब गोली
कारगील हो या गेलीपोली
लड़ कर जो शहीद हो जाता
इतिहास नया लिखवाता
खेल कर खून की होली
कारगील हो या गेलीपोली
दे अपने जीवन को झांसा
रोती पत्नी को दे दिलासा
नन्ही बिटिया है बड़ी भोली
कारगील हो या गेलीपोली
शहीदों को सब देते आदर
आचार्य हो मौलवी फादर
आहुति सब धर्मों की बोली
कारगील हो या गेलीपोली
हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं आकर
जित्वा वा दिल में उतर कर
गीता-बाइबल हमजोली
कारगील हो या गेलीपोली
-हहरिहर झा
झा
*(संगीत-रूप में उपलब्ध)
बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल
बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल
पूछपरछ मे धमधम गीरते बर्तन के खूब शोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
आफिसगर्ल से पटते पटते जगी हमें कुछ आस
गड़प कर गया बॉस उसे तो हमे न डाली घास
कभी न दोनो मिल पाये फिर नदियों के दो छोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
सेलगर्ल ने बक्सा खोला दिखलाये सब अंग
अर्धागिंनी ने आधे में ही किया रंग मे भंग
तांक-झांक सब ऐसी पकड़ी नजरों के हम चोर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
साकी बाला मुफ्त पिला कर कर गई मटियामेट
घर बिज़नेस न छोड़ा हमने उगल दिये सिकरेट
बुद्धि नशे मे भ्रष्ट हो गई मूर्खो के सिरमौर हुये
हम बहुत ही बोर हुये
- हरिहर झा
Love is an illusion :
hariharjha.wordpress.com
or
http://hariharjha.wordpress.com/2007/06/20/love-is-an-illusion/
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जीवन का फैलाव - एक चुभन
मौत का दंश एक - चुभन
जीवन के चौराहे पर
मिले कईं लोग
मित्रता की रश्मियों का
कर रहे उपभोग
पर प्यार की टीस में
डूबता मन – एक चुभन
जीवन का फैलाव - एक चुभन
मौत का दंश एक – चुभन
सृष्टि कितनी खोखली
धूल पत्थर के मोल
तारे ग्रह नक्षत्र
बस घूमते गोलगोल
पर अंगड़ाई लेती चेतना
नन्ही सी पृथ्वी मे - एक चुभन
जीवन का फैलाव - एक चुभन
मौत का दंश एक – चुभन
यों तो युद्ध मे छटपटाये
और गिरे शव हजार
बम फटे खून की होली
हुये अगणित वार
पर मां की गोद मे
तड़प कर मरता शिशु - एक चुभन
जीवन का फैलाव – एक चुभन
मौत का दंश एक - चुभन
नरक नौग्यारह रसातल
आदमी की नीव हिला गये
गगनचुंबी मानवों को
क्षुद्र कीड़े क्यों बना गये
पर दूधमुंहे मस्तिष्क मे
विषबीज का आरोपण - एक चुभन
जीवन का फैलाव - एक चुभन
मौत का दंश - एक चुभन।
-हरिहर झा