हरिहर झा

April 27, 2007

विसंगति

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:27 am

भूखे श्वान गुर्राते हैं
चांद चुपचाप खिसकने लगा हैं
इस शहर मे
कुछ लाशें जिन्दा इंसानो को
दफनाती हैं
कुर्सियां इंसानों की गर्दनपर बैठ कर
शान से अकड़ती है।
समझ मे नहीं आता
क्यों लगाई है लगाम
खिलते फूलों शाखों पत्तियों पर
क्यों ?

मेरी क्षुब्ध आत्मा तड़पती है
चिल्लाती है मेरी
फड़फड़ाती  हुई  आवाज।

जवाब मे 
नोच न पाने की पीड़ा से
व्यथित हो कर
भूखे श्वान
मुझे
संडासे से पकड़ कर
श्वानवाहन मे धकेल कर
दूर जंगल मे छोड़ आते हैं ।
  
             – हरिहर झा

For A spiritual feel :

http://hariharjha.wordpress.com/

2 Comments »

  1. अच्छी विसंगतियाँ हैं !
    घुघूती बासूती

    Comment by ghughutibasuti — April 27, 2007 @ 11:59 am |Reply

  2. Dhanyavaad Ghughooti Baasooti Ji

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 29, 2007 @ 7:33 am |Reply


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