हरिहर झा

April 19, 2007

नंगा बोल पड़ा

Filed under: तुकान्त, मंच, व्यंग्य, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:12 am

                       
कंगला डूबा चिन्ता मे तू मुझे लूट कर क्यों ले जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

रिश्वत भ्रष्टाचार से पनपे नेताजी की बात
पकड़े गये पद मन्त्री का अब कैसे मारें लात
भाषणबाजी लगे झाड़ने दिन देखा ना रात
अन्तरात्मा को घसीट  की विरोधियों पर घात

आत्मा की आवाज कहां की हाय गरीब की सुन ना पाय
 नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

बुद्धूराम समझ बैठे खुद बुद्धि के अवतार
दो और दो को तीन बतायें समझें खुद होंशियार
अक्ल बड़ी या भैंस कहें तो भैंस बड़ी है यार
समझाया तो गुस्से मे आकर कर देंगे वार

खाली भेजे मे भी चिन्ता उनका भेजा कोई न खाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय

धरम के ठेकेदार चले हैं ध्वजा धरम की थाम
छुरी छुपाई बगल में मुख से लिया राम का नाम
दौड़े सुख की चाह मे वृत्ति रही काम या दाम
मन मे हरि को खोज न पाये ढूंढे चारो धाम

नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने को जाय
नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय़।

                           - हरिहर झा

4 Comments »

  1. नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज करने को जाय
    नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे कपड़े क्यों ले जाय़।

    –बहुत खूब!! बधाई!

    Comment by समीर लाल — April 19, 2007 @ 2:08 am

  2. Dhanyavaad Samir Ji

    DhoNgi BhaktooN ke liye jo bhi kahaa jaay kam hei.

    -Harihar

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 19, 2007 @ 7:09 am

  3. वाह! बहुत मजेदार !!!

    Comment by रवि — April 19, 2007 @ 7:36 am

  4. Dhanyavaad Ravi Ji

    -Harihar

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 20, 2007 @ 2:05 am

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