हरिहर झा

April 14, 2007

मेरी मर्जी

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:31 am

मै स्वतन्त्र हूं
अपनी मर्जी का मालिक
गीता पढ़ुं या नमाज
कहां का कैसा समाज
जो डाले मुझ पर दबाव
यह मै और मेरा स्वभाव ।

मुझे है सड़ीगली प्रथाओं से परहेज
यह बात अलग
कि खुद अपनी इच्छा से
बेटी के लिये दे रहा दहेज
बड़े आये तुम  हड्डी मे कबाब
कैसा और कोनसा दबाब
अपना घर फूंक कर
पितरों की शांति के लिये
बुलाता पन्डितों की फौज
शान से करवाता मृत्युभोज
भाड़ मे जाय समाजसुधार
मेरा स्टेटस, मेरा अहम्
मै जो करूं मेरी मर्जी ।

हां मर्जी गई भाड़ मे
जब जीन्स पहने कोई ग्रामीणबाला
तो करदो उसका मुंह काला
रचाये ब्याह उंचे  कुल में
नीचे  कुल की छोरी
या विधवा बने फिर से दुल्हन
हमारा करेगी मानमर्दन
तो काट कर रख देगें गर्दन
रहे अपनी मर्जी से अकेली
पति के नाम पर आंसू बहाकर
या अब लो जीवनमरण का प्रश्न
कोई अपनी इच्छा से
होना चाहे सती
तो धर लेगें मौन
दबाव देने वाले हम कौन
उसके प्राण  उसकी मर्जी  ।

भीतर का आतंकवादी
भावनाओं का करता ब्लेकमेल
और चिल्लाता
मुझे किसी ने बहकाया नहीं
फंसाया नहीं
गुमराह नहीं किया
मजहब के लिये मैं करता आत्मबलिदान
दुनियां, समाज और यह परिवेश
क्या करें  ?
जो मै करता वह मेरी मर्जी ।

                        - हरिहर झा

2 Comments »

  1. बहुत जबर्दस्त कविता लिखी है आपने । हमें दर्पण दिखा दिया ।
    घुघूती बासूती

    Comment by ghughutibasuti — April 14, 2007 @ 6:40 am

  2. Dhanyavaad Ghughooti Ji

    Jaan kat khushi hui ki aapko kavitaa achchhi lagi.

    -Harihar

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 15, 2007 @ 5:08 am

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