क्षतिपूर्ति
मानव जिस अंग पर रह गया अधुरा
कुदरत और रास्ते से कर देती पूरा
चकराये विश्लेषक जहां से तू आधा
वहां से दी खासियत दूर कर दी बाधा
प्यार जिन्हे मिला नहीं हिनता से भर जाते
हिट करते औरो को हिटलर से हो जाते
प्रकृति की भूल से खा ली जो चोंट
क्षतिपूर्ति मिल जाती भर जाती खोट
मनस्विद निगोड़े देखते क्यो न अच्छाई
जड़ मे से खोज लाते कैसी भी बुराई
वे कहते अवश्य ही कहीं से तू कम है
तेरे व्यक्तित्व मे जिससे दमखम है
कमजोर आंखे तुझे बना गई चित्रकार
कानो से बिथोविन बन गये संगीतकार
कौशल व प्रतिभा से पाइलट बन जाते
बौनापन हिनग्रंथी महज वे भर पाते
आपकी बातों मे मजा बहुत आ गया
कुछ भी जोड़ने को मेरे मन भागया
शेर लपकने मे दिखलाते हैं स्फुर्ति
आलसी मन होगा हो गई क्षतिपूर्ति
बोझ से लदी होंगी फुदकती तितलिया
गम मे डूबी होंगी तैराक मछलिया
मेरे नाखुन मे कुछ दर्द सा हो जाता
बदले मे काश मैं मिलियोनर हो जाता
कहते हो सत्य तुम स्वीकार मै करता हूं
तुम्हारी थ्योरी यों तुम पर मै धरता हूं
दिमाग से रुग्ण जो स्वयं को पाते
क्षतिपूर्ति करने को मनस्विद हो जाते।
-हरिहर झा
अरे भईया थीम बदलिए। बैकग्राऊंड कलर ऐसा है कि कुछ नहीं पढ़ा जा रहा।
Comment by श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' — April 1, 2007 @ 9:45 am
बोझ से लदी होंगी फुदकती तितलिया
गम मे डूबी होंगी तैराक मछलिया
बढ़िया है!
Comment by अनूप शुक्ला — April 1, 2007 @ 1:06 pm
Anoop Ji
Aapko Kavita pasand aayi yah jaan kar mujhe bahut prasannataa hui.
Samay-Samay par utsaah-vardhan va sujhaav dete rahiye is aashaa ke saath.
-Harihar
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 1, 2007 @ 11:59 pm
Sharma Ji
Sujhaav achchaa hei. Vichaar kar rahh huN.
-Harihar
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 2, 2007 @ 12:00 am
Sharma Ji
Batlaaiye, Yah theme kaisi lag rahi hei?
-Harihar
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — April 4, 2007 @ 4:55 am