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पिचकारी खेले ससुरी ऐसे
रंग फेंक कर के मचलती कैसे
बौछार तीर की निकलती ज्वाला
चमकार बिजली की झूमती बाला
लुभायमान लगती रंग से भरी वो
लम्बी छरहरी लगती परी वो
हुडदंग के बीच बेखबर हो घूमती
आंचल में रंग लिये मस्ती से झूमती
जग किसके रंग से रंगमय हो रहा
छलकता तारुण्य नयन से बह रहा
नादानी देख कर उसे न डांटना
पीते ही स्नेह वह चाहती बांटना
कलाई से पकड़ कोई मसखरी करता
तन भीगा मन कैसी ख्वाहिश से भरता
कोई भी मनचला मन में न डरता
कस कर हथेली से आलिंगन भरता
नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी?
सबके आगोश में बेशरम वैसी
ख्याल बुरा लाये तो देगी वो गारी
वो है तुम्हारी प्यारी पिचकारी
-हरिहर झा
मार्च 1, 2007
http://hindinest.com/kavita/2007/06.htm
http://rachanakar.blogspot.com/2007/03/hori-kherat-nakhari-nar.html
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होरी खेलूँगी श्याम संग जाय
पता नहीं ये नारद जी कौन से मूड में रहते हैं। आज सबेरे जितने चिट्ठे देखे उनकी चर्चा कर दी। अभी देखा तो जितने सबेरे चर्चित हुये उससे अधिक छूट गये। लिहाजा दुबारा मुखातिब हूं।
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रचनाकार पर हरिहरझा कहते हैं-
नखरारी नार की अल्हड़ता कैसी
सबके आगोश में बेशरम वैसी
ख्याल बुरा लाये तो देगी वो गारी
वो है तुम्हारी प्यारी पिचकारी
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — March 8, 2007 @ 3:20 am
बहुत देर बाद यह दिखा नारद पर…
सुंदर कविता है होली के परिपेक्ष में बधाई!!
Comment by Divyabh — March 8, 2007 @ 9:09 am
Dhanyavaad Divyabh
Comment by Harihar Jha हरिहर झा — March 9, 2007 @ 2:48 am