हरिहर झा

February 16, 2007

निकल कन्दराओं से

Filed under: तुकान्त, हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:40 am

निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद

सोंच रहा नवनीत ज्ञान का पास है फिर भी दूर
पा न सकूं पर यत्न किये जाने पर हूं मजबूर
 

जीवन क्या? मृत्यु क्या? क्यों बन्धन हैं इस काया के
मोक्ष मिले तो कैसे? कब चक्कर छुटें माया के

अहं ब्रह्म को याद किया दिल हुआ हर्ष से गद्गद्
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

देवपुत्र होने का मुझको चढ़ा कभी अभिमान
डारविन की खोज कहे मै बन्दर की संतान

त्यागतपस्या ब्रर्ह्मचय को जब आदर्श बनाया
खगमृग जैसी कामवासना फ्रायड ने बतलाया

कीटपतंगो़े सा नरजीवन नीत्शे ने कर दी हद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद

कहां ज्ञान को सरल बनाने रामकथा रच डाली
रामराम रट छुरी बगल मे बस आडम्बर खाली

शब्दों के रेशों की डोरी खुद को बंधता पाया
हर पुस्तक जंजीर बनी कारागृह मन को भाया

पोथी लिख लिख हुआ मुझे लो ब्रह्मा होने का मद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद।

  -हरिहर झा
अगस्त 15, 2005
 

http://www.hindinest.com/kshala/015/15ks2.htm
 

मदिरा ढलने पर

Filed under: तुकान्त, मंच, हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:28 am

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

प्यास बुझाने पानी मांगा
अमृत की अब चाह नहीं

नन्हा दीपक साथ मे हो
आवश्यक जगमग राह नहीं

मौत आये यों सजधज कर
फिर र्स्वगलोक मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

दुनिया मे नहीं कोई पराया
सब के सब अपने देखे

सबकी यादें मीठी मीठी
फिर मिलने के सपने देखे

क्या खूब लुभाती मृगतृष्णा
तृप्ति मिलने पर क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

निंदक नियरे पानी बन कर
चित साफ करें धोयंे विकार

शत्रु भी कर दें सावधान
हों पग बढ़ने को जब तैयार

खलनायक मे जब राम छिपा
प्रभु प्रगट हुये तो क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

कांटे भी रक्षा करने को
तैयार खड़े हैं होशियार

फूलों का उपवन क्यों चाहूं
हर कलि सुगंधित है अपार

जुगनू की जगमग अति सुन्दर
पूनम की रात मे क्या होगा

नजरों से गश आया साकी
मदिरा ढलने पर क्या होगा।

 -हरिहर झा
मई 1 2005

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm

बन कविता मुस्कुराती

Filed under: तुकान्त, मंच, हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:22 am

मन मे पीड़ा जब सताती,
बन कविता मुस्कुराती

दुख बने दो तट अधर के
प्यार की वाचा निकलती

थपेड़ों मे बन गई पतवार
जिव्हा सी मचलती

शांत कर ले मनगगन
मंझधारभंवरों मे सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

एटमी हथियार चुपचुप
कौन पागल या दिवाना

युद्ध मे लोरी सुनाता
स्तब्ध रह जाता जमाना

शोले उगलती तोप कैसे
शान्त रह कर फूल उगाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

सौम्य तो कभी वीररस
श्रृंगार से सजती सजाती

बन विदुषक वेदना को
पी सदा हन्सती हन्साती

घाव पर मलहम लगा कर
विश्व को करुणा  सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

यातना के शिविर मे जब
नर बने कीड़ेमकोड़े

शहीदों की याद में
गाती कविता हाथ जोड़े

प्रेरणा देकर दिलों मे
ज्योति की माला सजाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती।

-हरिहर झा
मई 1 2005 

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm

February 15, 2007

मौन मुखर!*

Filed under: गीत, मंच, साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:02 am

        
कैसे मन की अगन बुझे
राख मे शोल़े़, जलन तुझे

झुलसी लपटें क्यों सह कर
              मौन मुखर!

दिल बोले हर अंग जले
वाणी सरगम की निकले

सांसे चुपचुप क्यों डर कर
              मौन मुखर!

नभमण्डल के तारे मौन
जग की वाचा सुनता कौन

मानव आहें भरभर कर
              मौन मुखर!

भाव भरी  कविता गढ़ कर
सुरलय की सीढ़ी चढ़ कर

दिव्य साधना मे गल कर
             मौन मुखर!

मौन शुन्य से निकली सृष्टि
ब्रह्मज्ञान  की अनुपम द्रष्टि

मोक्षद्वार पर पहुंचेगा नर
              मौन मुखर!

जीवन से कुछ राहें निकली
पर जिस दिन अर्थी निकली

प्राणो के स्वर हुये मुखर
            मौन मुखर!

                    -हरिहर झा

(संगीत-रूप में उपलब्ध)
     

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

कीचड़ मे कमल

Filed under: अतुकांत, साउथ एशिया टाइम्स, साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:56 am

पाषाण हो चुका यह हृदय
जिससे चट्टाने आपस मे टकरा  कर
चूर होती
बह रही नदियों मे
पर अब भी
कोपले खिलने का अंदेशा
चिडि़यों के चहचहाते स्वर
सुनने की उत्कंठा
और फुलों से महकती
सुगंध के स्वप्न अभी बाकी ।

किसीने अपनी तलवार से
बंजर धरती पर
चीर दी अंतडि़यां
पर गरजते धमकाते बादलों मे
करुणा की गुंजाईश अब भी बाकी
निष्ठुर धरती से
भावुक संवेदना उपजने की आशा
अब भी बाकी
मुर्दा आसमान से
जीवनशक्ति   बरसाने की
अपील अब भी बाकी ।                       

रुहानी प्यार की कोई जगह नहीं
क्योंकि अब प्यार हो चुका है एक
सौदा
गणित का एक समीकरण
या एक कंप्यूटर प्रोग्राम
कुछ तत्वों का बहता हुआ  रसायन
कीचड़ के इस फैलाव मे भी
कमल खिलने की
उम्मीद अब भी बाकी।
                     -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

दिल का दर्द

Filed under: तुकान्त, मंच, साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:49 am

खोईखोई उलझनो का कुछ तो राज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

झांझर झमझम बजी सृष्टि का मूल
तारे ग्रह नक्षत्र चितवन की धूल
मेघ कालेछिद्र से नैन के काजल
युगयुगान्तर निकल गये कि जैसे पल

कल से बहते आंसुओं का समन्दर आज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

राजकुल की मर्यादा सबको भाई
भोली सी प्रेमलहर जा टकराई
क्या बला है ! प्राण किसलिये अटक गये
प्रमुख जिन्हें राजधर्म क्यों भटक गये

छोड़ दिया तख्त छोड़ दिया ताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

शरमा कर झुकी हुई नजर की हाला
चिन्गारी प्रेम की वियोग की ज्वाला
धधकते अंगार सा खून जब बहा
तड़पता सिसकता दिल मौन ही रहा

खुल कर रोने के लिये मोहताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है।

 -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

February 14, 2007

अंधेरा

Filed under: तुकान्त, मंच, व्यंग्य, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:10 am

अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

रोज वही सूरत घर में घर वाली
बांछॆ खिली देख आधी घर वाली

साली को देखा बिगङ गया साला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

रिश्वत दी रोकड़ा तो भी क्या पाया,
थाने में जा उसने सच-सच बताया।

किस बेवकूफ से पड़ गया पाला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

बहन की शादी निकाले कुछ जेवर ;
सट्टा लगाया बिगड़ गये तेवर।

अम्मा ने डांटा बिगड़ गई खाला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

चुनाव से पहले दिये जिनको नोट,
वे ही दे आये विरोधी को वोट;

वोटर की बुद्वि को पड़ गया ताला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

मानपत्र लेने की जुगत भिड़ाई,
पोल खोल मीडिया ने बहस छिड़ाई

पहनाई गले में जूतों की माला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

–हरिहर झा

2nd poem on:

http://shabdanjali.com/srujan/ujala20005.htm

मित्रों से झगड़ता चल

Filed under: मंच, शब्दान्जलि, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:04 am

मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल
बोर हुई इस दुनिया में तू मजा उन्हें भी देता चल।

अपनी बात को ऊंची रखे वो ऊंचा कहलायेगा
सब से कट कर निपट अकेला तपस्वी बन जायेगा
भूले भटके कोई अगर तुझे पूंछने आ जाय
जूते सिर पे रख ले फिर भी नहीं भागने पाये

बकझक करके गला पकड़ ले खरी खोटी सुनाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

मिले लड़ाई का अवसर तो दुश्मन से भी यारी हो
शांति ऎसी दो पल में बस लड़ने की तैयारी हो
समझ कि तेरे मधुर वचन बस गाली की तैयारी हो
फूलों की माला में खंजर चल जाने की बारी हो

फटे में बन्धु टांग अड़ा ले दुश्मन बन भिड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता च॥

भले लोग चुपचाप भला करने का बीड़ा उठायें
नियम बता दे इधर उधर के कुछ भि न कर पायें
काम नहीं केवल भाषण बाजी के अवसर चुनना
सीधी सच्ची बत कहे कोई तो कभी न सुनना

लम्बी बहस किये जा सबमें अपनी टांग अड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

-हरिहर झा

http://shabdanjali.com/kavita/harihar%20jha.htm

February 13, 2007

घोड़े

Filed under: अतुकांत, कृत्या — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:00 am

संपादकीय   टिप्पणी :

हरिहर झा की कविता द्वन्द्व के उस दर्द को बयान करती है जो अपनी जमीन से
कटने और सुविधा से जुड़ने के बावजूद कहीं ना कहीं अन्तर्मन में टीस देता रहता
है। आस्ट्रेलिया मे विस्थापित हरिहर झा ने अपनी इस ताकत को कचरे की टोकरी
मे डाल दिया था यह सोंच कर कि ये कवितायें नींद की गोलियों की तरह सुला देने
वाली आज की कविताओं के स्वाद की नहीं हैं । किन्तु कृत्या के आग्रह पर वे
अपनी बरसों पुरानी सोंच के साथ उपस्थित हुये हैं।

घोड़े

घोड़े महत्वाकांक्षाओं के
उंची उंची लालसाओं के
भागते हुये
सरपट  मैदान की बात ही क्या
चढ़ भी जाते हैं सीडि़यों पर
भले ही पैर लहूलुहान
कभी तो दुनियावी बोझे से लदा तांगा
कंधो पर उठाये
आकाश मे उड़ते हुये
भावना के परिन्दो को
नीचा दिखाते हुये¦

ये घोड़े दे गये मुझे
अथाह शक्ति,  धन दौलत
ईर्ष्या मित्रो की 
गालियां दुश्मनों की
अजनबियों की व्यंग्यमय मुस्कान
सब कुछ पा लिया
अपने ही बलबूते पर याने
बलपूर्वक इस घोड़े के बूते पर
सब कुछ पा लिया
अपने स्वयं की पूर्णाहूति देकर
मेंने     
अश्व नहीं
नरमेध यज्ञ मे
घोड़े को किया
यशस्वी विजयी कीर्तिमान ।

 -हरिहर झा
 
http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html

चलो फिर

Filed under: अतुकांत, कृत्या — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:29 am

चलो फिर
इस दिखावे के
यंत्रवत् जीवन से दूर
पिकनिक पर
संगी साथियों की टोली ले कर
समस्त औपचारिक वेशभूषा को तिलांजलि देकर
हंसी ठिठोली करते हुये
गुपचुप ही वहां पूरे लंचडिनर की व्यवस्था के बाद भी
चना चबेना ढुंढने का स्वांग रचते हुये ।

चलो फिर
फिल्मी र्तज पर गीतों से गला फाड़ते हुये
आदिवासी लोकगीतों की तरह
या फिर   आर्यों द्वारा गाई
    वैदिक ऋचाओं की तरह
सामुहिक अंतर्मन को सुरों में
अभिव्यक्त  करते हुये
कुछ दुर बुशवाक पर निकल कर 
राह भटकने का ढोंग कर लेने के बाद
मोबाइल पर संपर्क करते हुये ।

चलो फिर
कड़कती ठन्ड मे
गरम आंच का लुत्फ लेने
कोयले की
अंगीठी  पर हाथ सेंकने के लिये
अंगीठी मे छुपे हीटर का
स्वीच आन करते हुये।

चलो फिर
वृक्ष, प्रकृति, चांदतारों की
सुन्दरता का बखान कर
इन सबसे
मन शांत कर लेने की डिंग हांकने के बाद
जरा सी बात पर भड़क कर
मन ही मन भुनभुनाते हुये
चलो फिर
चले??????

- हरिहर झा

5th poem:

http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time.html

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