मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई
बैरा निगोड़ा पूछ जाता किया जो मैंने कहा
सलाम झुकझुक करके मन में टिप का लालच रहा
खाक छानी होटलों की चाहिए जो ना मिला
करोध मे हो स्नेह किसका? कल्पना से दिल हिला
प्रेम में नहला गई जब जम के तेरी डांट खाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
तेरी छाया मे पला सपने बहुत देखा किए
समृद्धि सुख की दौड़ मे दुख भरे दिन जी लिए
महल रेती के संजोए शांति मैं खोता रहा
नींद मेरी छिन गई बस रात भर रोता रहा
चैन पाया याद करके लोरी जो तूने सुनाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई
लाभ हानि का गणित ले जिंदगी की राह में
जुट गया मित्रों से मिल प्रतियोगिता की दाह में
भटका बहुत चकाचौंध में खोखला जीवन जिया
अर्थ ही जीने का अर्थ, अनर्थ में डुबो दिया
हर भूल पर ममता भरी तेरी हंसी सुकून लाई
मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई।
-हरिहर झा
16 मई 2006
http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/maakiyaad2.htm