पत्नी के इरादे सी पाषाण
बस, नाराज हो कर देती कंपकंपी
बेरुखी ऐसी
जैसे निश्चल हवा का स्पर्श – गुमसुम
तीर की तरह घुसती
शिकायती फुसफुसाहट कानो में
तूफानी चाल से
तुषार की माला यों फॆंकी
बिखरा दिये कीमती सफेद मोती
अब सन्नाटा चुभ रहा सुइयों की तरह
कब पिघलेगा मौसम का हृदय ?
घेर लिया उच्छवास ने
धुंधलके में
कोड़े सी लगती शीतलहर
और तभी
लाल कपोलों पर रसीले ओंठ
आमंत्रण देते
गरमाहट की बाहों में आलिंगन करने
दहकती सांस मिल गई प्रेम की
क्या समझूं इसे?
कि मैं, शरद और अलाव
याने
पति पत्नी और वो !
– हरिहर झा
अक्टूबर1, 2006
http://www.hindinest.com/kavita/2005/173.htm