हरिहर झा

February 16, 2007

चुप हूं

Filed under: अनुभूति, मंच, शेर, साउथ एशिया टाइम्स — by Harihar Jha हरिहर झा @ 7:06 pm

खुल कर रोया था जनमने के बाद
हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं।

अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका है
सामने उसके उसका नाम लेने से मैं चुप हूं।

भूखा पेट मेरा और डकार लेने को कहा
चूहा पेट का न दिख जाय इसलिए मै चुप हूं।

सोचा था हंस हंस कर पियेंगे ग़म के आंसू
सैलाब ग़म का आया इसलिए मैं चुप हूं।

दिल से दरिया-ए-इश्क बहा देने के बाद
कहा कि अब अश्क बहा इसलिए मैं चुप हूं।

घाव पर मलहम के बदले नमक छिड़का
ये भी क्या कम है खुदा कि मैं चुप हूं।

गुनाह बहाना बना नए गुनाह करने को
फंसा दलदल मे पर ये तमाशा कि मैं चुप हूं।

क्या बोलूं जब पूछा खुदा ने गुनाहों का सच
सच केवल इतना ही कि तू पूछे और मैं चुप हूं।

http://www.anubhuti-hindi.org/dishantar/h/harihar_jha/chup.htm

No Comments »

No comments yet.

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

Leave a comment

Powered by WordPress.com