मित्र !
हम तो चले थे
उस नकली
और मशीनटाइप जिन्दगी से दूर
बाइसिकल उठाये
सैर पर
सारी औपचारिकताओं को छोड़ कर
दिल की बात करने
पर ट्यूब टायर मे फंसे कांटे
दुख अपना कैसे बांंटे
मित्र !
हम तो चले थे
अंर्तमन की लिप्सा को
सुरों मे बांधते हुये
शरमलोकाचार की दीवार लांघते हुये
फूहड़ फिल्मी गीतों से गला फाड़ते हुये
बेसुरे राग मे
अब सुनसान
इस नदी किनारे बैठ कर
अगर रोया या गाया
तो हंस पड़ेगी
हमारी ही छाया।
मित्र !
बहुत हो गई
मीठी कोयल की तान
खूब कर लिया
खुले आसमां का बखान
प्रकृति मे एकरूप होने का दावा
मानसिक शांति का बहलावा
कच्ची और कांटेदार सड़क पर
धूल फांकते हुये
अब पैदल ही चलो
भीष्म बनी कांटो से बिद्ध
साइकिल रगड़ कर
थोड़ा गुस्से से भड़क कर
पर थोड़ा
मन ही मन बिगड़ते हुये
अब वापस चलो मित्र <
-हरिहर झा
15 अप्रेल 2004
मित्र! हरिहर झा पुरस्कृत
http://www.hindinest.com/kshala/014/14ks3.htm