हरिहर झा

February 16, 2007

बन कविता मुस्कुराती

Filed under: तुकान्त, मंच, हिन्दीनेस्ट — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:22 am

मन मे पीड़ा जब सताती,
बन कविता मुस्कुराती

दुख बने दो तट अधर के
प्यार की वाचा निकलती

थपेड़ों मे बन गई पतवार
जिव्हा सी मचलती

शांत कर ले मनगगन
मंझधारभंवरों मे सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

एटमी हथियार चुपचुप
कौन पागल या दिवाना

युद्ध मे लोरी सुनाता
स्तब्ध रह जाता जमाना

शोले उगलती तोप कैसे
शान्त रह कर फूल उगाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

सौम्य तो कभी वीररस
श्रृंगार से सजती सजाती

बन विदुषक वेदना को
पी सदा हन्सती हन्साती

घाव पर मलहम लगा कर
विश्व को करुणा  सीखाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती

यातना के शिविर मे जब
नर बने कीड़ेमकोड़े

शहीदों की याद में
गाती कविता हाथ जोड़े

प्रेरणा देकर दिलों मे
ज्योति की माला सजाती

मन मे पीड़ा जब सताती
बन कविता मुस्कुराती।

-हरिहर झा
मई 1 2005 

http://www.hindinest.com/kavita/2005/101.htm

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