निकल कन्दराओं से
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
वात्स्यायन के कामसूत्र सूरतुलसी मीरा के पद
सोंच रहा नवनीत ज्ञान का पास है फिर भी दूर
पा न सकूं पर यत्न किये जाने पर हूं मजबूर
जीवन क्या? मृत्यु क्या? क्यों बन्धन हैं इस काया के
मोक्ष मिले तो कैसे? कब चक्कर छुटें माया के
अहं ब्रह्म को याद किया दिल हुआ हर्ष से गद्गद्
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
देवपुत्र होने का मुझको चढ़ा कभी अभिमान
डारविन की खोज कहे मै बन्दर की संतान
त्यागतपस्या ब्रर्ह्मचय को जब आदर्श बनाया
खगमृग जैसी कामवासना फ्रायड ने बतलाया
कीटपतंगो़े सा नरजीवन नीत्शे ने कर दी हद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद
कहां ज्ञान को सरल बनाने रामकथा रच डाली
रामराम रट छुरी बगल मे बस आडम्बर खाली
शब्दों के रेशों की डोरी खुद को बंधता पाया
हर पुस्तक जंजीर बनी कारागृह मन को भाया
पोथी लिख लिख हुआ मुझे लो ब्रह्मा होने का मद
निकल कन्दराओं से मैने लिखे वेदउपनिषद।
-हरिहर झा
अगस्त 15, 2005