हरिहर झा

February 16, 2007

गुनगुनी धूप है

Filed under: अतुकांत, अनुभूति — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:51 pm

अलगाई लतिका ने
वृक्ष के सीने को
ले लिया बाहों में
हंस पड़ा पवन
मुस्काया मन ही मन
रात तो है जा चुकी
अब गुनगुनी धूप है

क्षीर का स्नान कर
विदा ली थी चांदनी ने
भेज गई सुरभि
गुलाब की पंखुड़ी में
सेज की गंध घुली
बोराए बहार में
गाने लगे अलि
झूम रहे तितली पर

उभरी थी प्रीत कभी
सपनों की सरगम से
निशा की डराती
गुफा से गुजरता
दहकती दुपहरिया की
स्वेद का समागम
गंगा की;, गगन की
गहराई में
यही गुनगुनी धूप है।

रजनी निगोड़ी
पोत गई थी कालिमा
अवनि के मुख पर
शबनमी आंसू बहा
रोती मचलती बावरी
कोन पोंछे कालिमा अब
कोने पोंछे आंसुओं को
मीठी मीठी सुबह आई
हर्षमय उल्लास देती
सौन्दर्य का उपहार देती
गुनगुनी यह धूप है।

-हरिहर झा

http://www.anubhuti-hindi.org/smasyapurti/samasyapurti_01/01_04pravishtiyan1.htm#hj

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