हरिहर झा

February 15, 2007

दिल का दर्द

Filed under: तुकान्त, मंच, साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:49 am

खोईखोई उलझनो का कुछ तो राज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

झांझर झमझम बजी सृष्टि का मूल
तारे ग्रह नक्षत्र चितवन की धूल
मेघ कालेछिद्र से नैन के काजल
युगयुगान्तर निकल गये कि जैसे पल

कल से बहते आंसुओं का समन्दर आज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

राजकुल की मर्यादा सबको भाई
भोली सी प्रेमलहर जा टकराई
क्या बला है ! प्राण किसलिये अटक गये
प्रमुख जिन्हें राजधर्म क्यों भटक गये

छोड़ दिया तख्त छोड़ दिया ताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है

शरमा कर झुकी हुई नजर की हाला
चिन्गारी प्रेम की वियोग की ज्वाला
धधकते अंगार सा खून जब बहा
तड़पता सिसकता दिल मौन ही रहा

खुल कर रोने के लिये मोहताज है
क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है।

 -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

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