हरिहर झा

February 15, 2007

कीचड़ मे कमल

Filed under: अतुकांत, साउथ एशिया टाइम्स, साहित्य कुन्ज — by Harihar Jha हरिहर झा @ 8:56 am

पाषाण हो चुका यह हृदय
जिससे चट्टाने आपस मे टकरा  कर
चूर होती
बह रही नदियों मे
पर अब भी
कोपले खिलने का अंदेशा
चिडि़यों के चहचहाते स्वर
सुनने की उत्कंठा
और फुलों से महकती
सुगंध के स्वप्न अभी बाकी ।

किसीने अपनी तलवार से
बंजर धरती पर
चीर दी अंतडि़यां
पर गरजते धमकाते बादलों मे
करुणा की गुंजाईश अब भी बाकी
निष्ठुर धरती से
भावुक संवेदना उपजने की आशा
अब भी बाकी
मुर्दा आसमान से
जीवनशक्ति   बरसाने की
अपील अब भी बाकी ।                       

रुहानी प्यार की कोई जगह नहीं
क्योंकि अब प्यार हो चुका है एक
सौदा
गणित का एक समीकरण
या एक कंप्यूटर प्रोग्राम
कुछ तत्वों का बहता हुआ  रसायन
कीचड़ के इस फैलाव मे भी
कमल खिलने की
उम्मीद अब भी बाकी।
                     -हरिहर झा

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/HariHarJha/HariHarJha_main.htm

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