हरिहर झा

February 14, 2007

मित्रों से झगड़ता चल

Filed under: मंच, शब्दान्जलि, हास्य — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:04 am

मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल
बोर हुई इस दुनिया में तू मजा उन्हें भी देता चल।

अपनी बात को ऊंची रखे वो ऊंचा कहलायेगा
सब से कट कर निपट अकेला तपस्वी बन जायेगा
भूले भटके कोई अगर तुझे पूंछने आ जाय
जूते सिर पे रख ले फिर भी नहीं भागने पाये

बकझक करके गला पकड़ ले खरी खोटी सुनाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

मिले लड़ाई का अवसर तो दुश्मन से भी यारी हो
शांति ऎसी दो पल में बस लड़ने की तैयारी हो
समझ कि तेरे मधुर वचन बस गाली की तैयारी हो
फूलों की माला में खंजर चल जाने की बारी हो

फटे में बन्धु टांग अड़ा ले दुश्मन बन भिड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता च॥

भले लोग चुपचाप भला करने का बीड़ा उठायें
नियम बता दे इधर उधर के कुछ भि न कर पायें
काम नहीं केवल भाषण बाजी के अवसर चुनना
सीधी सच्ची बत कहे कोई तो कभी न सुनना

लम्बी बहस किये जा सबमें अपनी टांग अड़ाता चल
मित्रों से झगड़ता चल
बीबी पे बिगड़ता चल।

-हरिहर झा

http://shabdanjali.com/kavita/harihar%20jha.htm

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