हरिहर झा

February 14, 2007

अंधेरा

Filed under: तुकान्त, मंच, व्यंग्य, शब्दान्जलि — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:10 am

अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

रोज वही सूरत घर में घर वाली
बांछॆ खिली देख आधी घर वाली

साली को देखा बिगङ गया साला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

रिश्वत दी रोकड़ा तो भी क्या पाया,
थाने में जा उसने सच-सच बताया।

किस बेवकूफ से पड़ गया पाला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला

बहन की शादी निकाले कुछ जेवर ;
सट्टा लगाया बिगड़ गये तेवर।

अम्मा ने डांटा बिगड़ गई खाला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

चुनाव से पहले दिये जिनको नोट,
वे ही दे आये विरोधी को वोट;

वोटर की बुद्वि को पड़ गया ताला;
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

मानपत्र लेने की जुगत भिड़ाई,
पोल खोल मीडिया ने बहस छिड़ाई

पहनाई गले में जूतों की माला,
अंधेरा अंधेरा कहां है उजाला।

–हरिहर झा

2nd poem on:

http://shabdanjali.com/srujan/ujala20005.htm

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