हरिहर झा

February 13, 2007

चलो फिर

Filed under: अतुकांत, कृत्या — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:29 am

चलो फिर
इस दिखावे के
यंत्रवत् जीवन से दूर
पिकनिक पर
संगी साथियों की टोली ले कर
समस्त औपचारिक वेशभूषा को तिलांजलि देकर
हंसी ठिठोली करते हुये
गुपचुप ही वहां पूरे लंचडिनर की व्यवस्था के बाद भी
चना चबेना ढुंढने का स्वांग रचते हुये ।

चलो फिर
फिल्मी र्तज पर गीतों से गला फाड़ते हुये
आदिवासी लोकगीतों की तरह
या फिर   आर्यों द्वारा गाई
    वैदिक ऋचाओं की तरह
सामुहिक अंतर्मन को सुरों में
अभिव्यक्त  करते हुये
कुछ दुर बुशवाक पर निकल कर 
राह भटकने का ढोंग कर लेने के बाद
मोबाइल पर संपर्क करते हुये ।

चलो फिर
कड़कती ठन्ड मे
गरम आंच का लुत्फ लेने
कोयले की
अंगीठी  पर हाथ सेंकने के लिये
अंगीठी मे छुपे हीटर का
स्वीच आन करते हुये।

चलो फिर
वृक्ष, प्रकृति, चांदतारों की
सुन्दरता का बखान कर
इन सबसे
मन शांत कर लेने की डिंग हांकने के बाद
जरा सी बात पर भड़क कर
मन ही मन भुनभुनाते हुये
चलो फिर
चले??????

- हरिहर झा

5th poem:

http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time.html

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