हरिहर झा

February 13, 2007

घोड़े

Filed under: अतुकांत, कृत्या — by Harihar Jha हरिहर झा @ 10:00 am

संपादकीय   टिप्पणी :

हरिहर झा की कविता द्वन्द्व के उस दर्द को बयान करती है जो अपनी जमीन से
कटने और सुविधा से जुड़ने के बावजूद कहीं ना कहीं अन्तर्मन में टीस देता रहता
है। आस्ट्रेलिया मे विस्थापित हरिहर झा ने अपनी इस ताकत को कचरे की टोकरी
मे डाल दिया था यह सोंच कर कि ये कवितायें नींद की गोलियों की तरह सुला देने
वाली आज की कविताओं के स्वाद की नहीं हैं । किन्तु कृत्या के आग्रह पर वे
अपनी बरसों पुरानी सोंच के साथ उपस्थित हुये हैं।

घोड़े

घोड़े महत्वाकांक्षाओं के
उंची उंची लालसाओं के
भागते हुये
सरपट  मैदान की बात ही क्या
चढ़ भी जाते हैं सीडि़यों पर
भले ही पैर लहूलुहान
कभी तो दुनियावी बोझे से लदा तांगा
कंधो पर उठाये
आकाश मे उड़ते हुये
भावना के परिन्दो को
नीचा दिखाते हुये¦

ये घोड़े दे गये मुझे
अथाह शक्ति,  धन दौलत
ईर्ष्या मित्रो की 
गालियां दुश्मनों की
अजनबियों की व्यंग्यमय मुस्कान
सब कुछ पा लिया
अपने ही बलबूते पर याने
बलपूर्वक इस घोड़े के बूते पर
सब कुछ पा लिया
अपने स्वयं की पूर्णाहूति देकर
मेंने     
अश्व नहीं
नरमेध यज्ञ मे
घोड़े को किया
यशस्वी विजयी कीर्तिमान ।

 -हरिहर झा
 
http://www.kritya.in/06/hn/poetry_at_our_time5.html

2 Comments »

  1. यदि सपनों के घोड़े नहीं दौड़ाये, तो आागे कैसे बढ़ पाये।

    Comment by उन्मुक्त — February 14, 2007 @ 1:13 am |Reply

  2. TippaNi ke liye dhanyavaad Unmukta Ji.
    Bilkul sahi kahha aapne
    par jaisaa ki aap jaante hi hei yah kavita
    us mahatvaakaanNksi ki hei jisne
    apni laalsaayeN to puri kar li
    par svayaM kaa balidaan kat diyaa.

    -Harihar

    Comment by Harihar Jha हरिहर झा — February 14, 2007 @ 8:06 am |Reply


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