सोंचा था ईश्वर ने
दुनियां हो रंगीन
ना रहे कोई एकाकी
जानवर तो जानवर
फिर नर क्यों अकेला?
जैसे हाथी और घोड़ा
कबुतर और चिडि़या, बंदर और गुरिल्ला
आदमी के साथ करो कुछ फिट
पर लुप्त हो गये - गुम हुये होबिट ।
क्या अच्छा न होता कि
होमो-सेपियन के अलावा
एक दूसरी तरह का नाइंसान इंसान
जो इन्सान जितना जानवर न हो
पर इन्सानियत में कम न हो !
डर गया विधाता
एक बुद्धू - याने बुद्धिशाली आदमी
बना बैठा हिन्दू-मुसल्मां
बामन-शूद्र - अलगअलग नस्ल….
आगया जो दूसरी तरह का इंसान
फिर कैसे रोक पायेगा खुले आम
हत्या, मारपीट
बजेगी ईट से ईट
तो क्या होगा?
मानव पियेगा लहू
और होबिट खायेगा मीट
गुम हुये होबिट ।
होबिट ने सीखा खानापकाना
गुमसुम होकर
मानव के सामने सिर झुकाना
होबिट-मानव भाई-भाई
पड़ न जाय भारी कीमत चुकाना
बड़ी चालु चीज़ है आदमी - करेगा चीट
गुम हुये होबिट ।
मुख में बुद्ध
भीतर से क्रुद्ध
इंसान-इंसान में
होता विश्वयुद्ध
लाखों लोगों को
एटम की गर्मी में
भूनेगा
पकायेगा
खा पायेगा इतना !
सोंच कर यही मर जायगा होबिट
गुम हुये होबिट ।
वे संतुष्ट थे झोपड़ी में
जंगल में
समृद्धि के तनाव से मुक्त;
ये तो इन्सान चिढ़ गया
ऐसे भोलेपन पर
उदारता का ढोंग रच कर
जाने क्या लाद दिया
होबिट पर
कहती किंवदंतियां
वे थे “नरक के वासी”
न होबिटस्तान मांगा
न और कुछ
तीन या चार फिट के ये वामन -
नन्हे ठिगने बौने लोग
धरती छोड़ गये - विशाल
एक नन्हे ठिगने बौने दिल वाली
लालची नस्ल के लिये
बस गुम हुये होबिट।
- हरिहर झा
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मस्ती के आलम में
कहां से चली आई
एक परीक्षा
जिसके लिये
मै बिल्कुल तैयार नहीं
क्या बताऊं !
मेरा तो बज गया बाजा
मै ऊंघ रहा हूं
स्वप्न में भी
यह परीक्षा है या स्वप्न ?
पर यह भाव कि
खेला किया और गवांया जीवन
पढ़ा नहीं और अब
असफल कोशीश !
क्या करुं ?
थर थर कांपे तन मन
कितना असहाय !
बेखबर दुनियां से
अनाथ अनजान सा
डरा सहमा सा
मर गया मैं या मेरी नानी
पर श्राद्धपींड नजर आ गये।
काली डरावनी
गुफा मे खो गया टाइमटेबल
घंटी बजेगी घनघन …
प्रश्न कब होंगे सामने
कुछ पता नहीं
शायद आज ही !
अचानक कापी बनी आसमान
मेरा हाथ कलम
सूख गई सतकर्मों की स्याही
सामने यमराज सा परीक्षक
या फिर परीक्षक सा यमराज !
पता ही न चला
कैसी परीक्षा ? कैसी निन्द्रा ?
बाप रे बाप !
बचाओ मुझे बचाओ !!
मैं देख रहा हूँ
अपना ही मृत शरीर
यह मेरी नींद है या चिरनिंद्रा ?
घेरे हुये स्वजन
रोती बिलखती
और चीखती चिल्लाती पत्नी
फिर भी मेरी…
आंख क्यों नहीं खुल रही !
- हरिहर झा
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रो पड़ा सुन कर कहानी गहन यह संवेदना
दिल नहीं पत्थर हो वे ना समझ सकते वेदना
भेद खुलवाने को शठ का निहत्थे पर वार हो
यन्त्रणा देता कसाई भोंक रहा कटार हो
पिघलता लोहा जब दिल में मशीनी हथियार हो
बरसता बन दर्द बिजली आग की बौछार हो
दिल को ठंडक दे सकूँ कुछ भी करते ना बना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
रेंगते कीड़ों का आतंक बस गये हैं घाव में
मनोरंजन कर रहे मवाद पीते चाव में
खून ज्यों लावा पिघलता अस्थि मज्जा जल रहे
वायरस उन्माद के धर्मान्धता के पल रहे
लहू के आंसू छलकते जीभ खुलना है मना
चोंट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
हे विधाता यन्त्रणा क्यों ? बस यही मलाल है
दिया क्यों शरीर? सारे दर्द की जंजाल है
मनोवृत्ति परपीड़क शैतान की ही चाल है
मौत से बदतर हुआ इस ज़िन्दगी का हाल है
बस करो पिशाच मानवता के उर को छेदना
चोट तुझको रो पड़ा मैं गहन यह संवेदना
-हरिहर झा
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पड़ोस की वह अन्धी लड़की
पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
टीस उठती है मेरे दिल में
इतना भी नहीं जान पाती वह
और जान कर करेगी भी क्या ?
देखने से तो रही बिना आंख के
वैसे वह जन्म से अन्धी नहीं
सहपाठिन थी मेरी
केमेस्टी की प्रयोगशाला में
हुई एक दुर्घटना
ऐसी अफवाह है
कि थी किसी की शरारत
पर जब वह पूछ बैठती है
यह दिन है या रात ?
फटती हैं मेरे दिल की नसें
चीर जाती हैं सीने की पसलियां
निकलती पीड़ा की बूंदें
समा जाती रक्त में
मैं पागल हो उठता हूँ ।
कभी कभी सोंचता हूँ
क्यों न उसके इलाज का खर्च भी
मैं उठा लूं
पर इतना भी संवेदना में
बह जाना
ठीक नहीं
क्यों कि इसमें मैंने… मैंने…
क्या किया था
इसका प्रमाण भी क्या है
कौन जानता है इसे?
हां, जो मैं भुगत रहा हूँ
इसका नाम है कुछ
गर्मी दिमाग में
कि लपलपाती वेदना की भाप
फेफड़ों से बाहर निकलने पर
श्वांस नली
चिल्लाती है
ऐसी टीस उठती है ।
- हरिहर झा
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चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें
छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें
गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान
चीर कलेजा क्षुधा मिटाने की मन में ली ठान
नरक बनी दुनिया सपने में आती स्वर्ग समान
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
मानमनावन कैसे हो दिल में हसरत की आग
अधर मौन होकर सोचे अब जागे मेरे भाग
दिल डूबा गहराई में भावों के स्वप्निल पंख
ओले बन अंगारे बरसे कलियां मारे डंख
शीतल छांव के दो पल, बदले में वियोग हाय राम !
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
खड़ा हुआ खलनायक देखो, बन कर भाग्य विधाता
हाय ! विदूषक मसखरी करता, सब्ज बाग दिखलाता
ठौर ना मिला प्रेम को, छलनी हुआ गया अब चैन
कैद हो गया अपराधी सा, अश्रुपूरित नैन
अमृत की दो बूंद जहर से मिल कर काम तमाम
आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम
Why Torture?
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( अति मह्त्वाकांक्षी लोग… क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…)
पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा
मैं देख रहा
ढलकता पानी जलधारा का
मैं छूना चाहता झिझकती उंगलियों से
टपकती करूणा इन बूंदों से
गिरती खाइयों में
जिसकी गहराइयां भयदायी
पर कुछ बूंदो की लपटें
महत्वाकांक्षा लिये
वाष्पिभूत होकर
उठी आकाश की ओर।
मैं ही हूं वाष्पिभूत जल
ऊपर को उठता हुआ
क्यों समझते तुम मुझे
क्षुद्र और नीचा !
देखता हूँ
न जाने क्यों
नीचे रह गये
कीड़े-मकोड़े आनंदित हैं
मैं जल रहा नन्हेपन की पीड़ा में
घनीभूत हो रहा
ओछेपन का भाव
और सूइयां चुभती
हीन ग्रन्थि की
मैं चिल्लाता हूं
देखो , मुझे देखो
मेरी ऊँचाई !
पर मग्न हो तुम स्वयं में
विनाशकारी धारा से अनजान
बिजली के तार पर
बैठी चिड़िया की तरह;
मैं भी चहचहाना चाहता
कुछ परागकण
फैलाता वायुमण्डल में
बिखरा देता कुछ बीज धरती पर
मकसद वही
विशाल वृक्ष से प्रतिस्पर्धा करने ।
मेरे कम्प्यूटर का की बोर्ड
उपहास करता
मेरी आजीवन पीड़ा और बेचैनी पर;
व्यथा बेझिझक और अनन्त दुख
अंधकार में ढीले पड़ते स्नायु
तनाव से भरा जीवन
और मौत की क्षणभर आयु
निकली कीबोर्ड के बल्ब की चमक
आत्मसात होने
दूर गगन की
निहारिका की ओर
रह गई आधी अधूरी
धुयें की लकीर का छोर
इस ओर |
-हरिहर झा
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न मिली थी माँ की थपकियां
और अब खो दी
प्रेमिका की स्मित मुस्कान
तो चल पड़ा वह
आकांक्षा लिये विश्वविजय की
पत्थर सी जड़ आंखों में
एक सपना दबाये
जिसमें मंद झकोंरों से गुजरी किरण किरण
चंचल नयनो में प्रतिबिम्बित होती
उस मतवाली का
चेहरा उठाये
अधरों की ओंट से अधर जोड़ने की प्यास
चुहुल करते ली थी उसने अंगड़ाई
रंगीन छेड़छाड़ और बिखरते मोती
प्रेम का स्पन्दन
पर ह्दय को मसोस कर
दबा गया कोमल भाव
अकेलेपन का सताया
जब रिश्तों ने
झूठा नाटक रचाया
तो अलग थलग होकर
बिछाये थे जो अरमान
कुचल डाले उसने
अब तो चमक रही युगल मीनारें गगनचुंबी
जो फैला रही खून से सनी हुई बाहें
डूबा वह शतरंज की क्रीड़ा में
मोहरा बना
जुनून से भरा उसका माथा पकड़ा उंगलियों ने
फूट पड़ा एक दर्दनाक प्रतिशोध
जब बारूद बनी दमित कुंठा
विषमय बनी यौन पिपासा
ज्वाला चिंघाड़ी अन्तर्मन की गहराइयों से
अमंगल ही तो हुआ
पर हुआ जो धमाका
गाज गिरी जो मिट्टी को मथकर
राक्षस का उद्गम
जो सोंचता -
यह आतंकवादी दुनियां
क्यों मुझे ही कहती
आतंकवादी
मैं इसकी
सजा दूंगा
धमाकों से बरबाद होंगे
वे घरबार
सब के सब
दीवार बन कर
खड़े हैं मेरे और उसके बीच
ये सड़क और गलियां
जो उसके पास
नहीं ले जाती
कर दूंगा इन्हे तबाह
और जो मरेगें
उसके स्वजन
उसके चाचा, मामा, ताउ
मामुली किसान और मजदूर का भेष धरे
मैं खत्म कर दूंगा यह धोखा
बन्दूक और बम गोले हैं
मेरा पुरूषत्व
अहा ! मुझे मिलेगी मेरी मंजील
कैसा विपल्व ? कैसी विनाशलीला?
सब कुछ होगा कितना रोमान्टिक !
यह विस्फोट या संभोग?
मैं कोई विक्षिप्त नहीं ….
-हरिहर झा
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For A half poet
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मिला सम्मान उसे नकारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
हाय! क्षणभंगुर इन फूलों का जीवन
कुम्हलाकर सब व्यर्थ हो जायगा
दिखा दिखा कर अकड़ रहा हूं
क्षण गया यह तो अनर्थ हो जायगा
बिना तृप्त किये अहं मन मारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
धन भाग हुये इस माला के
मुझ महामहिम का कण्ठ पाया
धनभाग हुये इस धागे के
जो मेरी देह को छू पाया
जीत ली सारी दुनियां उसे हारूं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
पहनाओ मुझे हार बाद मे
दुनियां भर के लफड़े दे जाओ
भले ही मुर्ख बना कर पहना दो
बाद मे पहने कपड़े उतार जाओ
डूबा मन बिन माला के उबारुं कैसे?
हार पहनाया मुझे, हार उतारुं कैसे?
-हरिहर झा
Are you in a paper-made-boat? Read
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