कितना अजीब है !
मिलना निमन्त्रण
भूतपूर्व पत्नी की
शादी पर !!
जैसे कि
याद दिला दिया उसने
कैसे कैसे स्वप्न थे मेरे !
कि पत्नी भी बन पाये प्रेमिका
पर छोड़ो यार !
कहाँ की लजाती मुस्कान और
शौख अदाये!
नहीं बन पाई थी वह
रूक्मणी से राधा !
देना पड़ा था तलाक
क्योंकि मैं उसे
कैसे संभालता
जब वह छटपटा रही थी
बीमारी से
देख कर दिमाग धुँआता था कुहरे में
कि किसी गाय की रंभाहट लगता था
उसका चिल्ल्लाना !
उलझने क्या सुलझती
जब कोई एहसास नहीं हुआ
कि हो पाये सुलह हम दोनो में
पर खबरदार ! जो मुझे मक्कार, धूर्त समझा तो
पत्नी बीमार थी तो क्या
मैं उसका साथ देता !
हाँ , उस पर किये अहसानों के बदले
मैंने अपने पास रख ली है
हमारे शिशु की मासुम हँसी
चहकना, क्रन्दन और गुंजन
किस्मत से ले लिया मैंने
प्रतिशोध ऐसा
कि उसे माँ से मिलने नहीं दिया
वह तो केवल
अपनी ऊँगलियां
फिराती रही
समय की रेती पर ।
हथकड़ी बन गये थे
हमारी शादी के बन्धन
क्योंकि वह परले दर्जे की
स्वार्थी है
यह निमन्त्रण
कोई मुझे जलाने की तरकीब नहीं
उसकी चालाकी है
कि इस बहाने
हमारे… पर अब सिर्फ़ मेरे शिशु को
साथ लाऊँगा
और वह देख लेगी उसे
जी भर कर अपनी आँखों से
लगा पायेगी कलेजे से
पकड़ा दिया है मुझे यह
निमन्त्रण !
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/07/blog-post_03.html
Hobbits disappeared!
http://hariharjha.wordpress.com/2008/05/16/hobbits-disappeared/
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
क्रेन पर
ऊँचा चढ़ा कर,
चैन उसकी तोड़ दी
लोभ का दर्शन बना,
मझधार नैया छोड़ दी
ऋण-यन्त्र से
मन्दी बढ़ी,
पोखर में
डॉलर बह लिया
अर्थ की सरिता में
भोंडे नाच से मोहित किया
बहकता
उन्माद सिर पर
क्यों हमें बहका न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
सैज
सिक्कों की बनी,
सब बेवफ़ायें सो रही
मण्डी बनाया विश्व को,
निलाम ’गुडविल’ हो रही
गर्मजोशी बिकी,
सौदाई का जादू चल गया
शेयरों में
आग धधकी ,
लहू कितना जल गया
तड़पता सूरज
दहक कर
कहो क्यों झुलसा न देगा ।
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा
’उपभोग’ की
जय जय हुई,
बाजार घर में आ घुसे
व्यक्ति बना
’सामान’ तो,
रिश्तों में चकले जा घुसे
मोहक कला
विज्ञापनों की,
हर कोई इसमें फँस लिया
अभिसार में मीठा ज़हर,
विषकन्या बन कर डँस लिया
फैकी गुठली
रस-निचुड़ी,
कोई क्यों ठुकरा न देगा
लुढ़कता पत्थर
शिखर से,
क्यों हमें लुढ़का न देगा ।
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_7797.html
Hunger – 3 Faces
http://hariharjha.wordpress.com/2007/09/11/hunger-3-faces/
क्यों पोत रही तुम
मेरी सूखी हड्डियों पर
इन्द्रधनुषी रंग
उतर कर मेरे आंगन में !
क्यों जम्हाई लेने के बदले
ले रही मनमोहक अंगड़ाई;
चीखो और चिल्लाओ !
रोको मत
बहने दो दुख भरे आँसूओं को
क्यों कि मैं तो विमूढ़ हूँ
देख कर तुम्हारे
प्रेम से छलछलाते नयन
तुम मन में उभरते अंधड़ को
मत छिपा दो अभिसार की याचना से;
इधर जब भी
मैं उलझता अपने डगमगाते दायरों में
तुम चहकती हो इसे मेरी सफलता समझ कर
भावों और शब्दों का तुम्हारा ऐसा जुगाड़
कि मुझमें माचो देख पाने की दलील
सुन कर
हो रहा मैं पसीने से तरबतर;
देख कर तुम्हारी आँखों में
प्यार की नमी का सैलाब
फँस जाता भंवर में
और तुम …
तुम्हारे कमल जैसे चेहरे पर
तैरते
अधखुली आँखों के तीर
मेरी कोशिकाओं से
टपकाते हैं
केवल खून !
पर तुम हो कि इस
मेरी दर्द में दबी
हिसहिसाहट को
ले कर अपने अधरों पर
गुनगुनाती हो !
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/06/blog-post_19.html
Pleasure or Pain? :
http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm
झगड़ा हुआ नेताजी और पत्रकार में
मंहगाई की मार से बावले हुये पत्रकार ने
मला सिर पर बाम
लगाया नेताजी पर इलजाम
किसी कोमलांगी के बदन को छूकर
उसके घूंघट की ओंट से निकला एक विडियो टेप
दूसरे दिन व्यभिचार¸ दुराचार की
सुर्खियां छाई
बड़े बड़े अक्षरों में
हाय तौबा हुई
टांग खिंचाई की जनता ने
नाराज हो कर पत्रकारिता की गंदी चाल पर
नेता चिल्लाया और झल्लाया
गेर जिम्मेदार मिडिया पर
भनभनाया “उस दो कौड़ी के पत्रकार” पर
झगड़े मे फंसी युवती से
नाटक किया राखी का
शब्दों की बैसाखी का
उल्टा फंसाया कलमघीसू को
हथकड़ी पहनाकर
बाजार मे घुमाया
हुआ हंगामा सदन में
जब जनता रोती रही रोजी रोटी को
बिजली, पानी और सूखी खेती को
तो जिम्मेदार मिडिया और सूचना के नियन्त्रण पर
भाषण हुये एक्ट बनाने
असंतुष्टो को मनाने
सेमिनारों पर
रकम हुई स्वाहा
मुहं से निकला अहाहा !
मलाई गई नेताजी को
हिस्सा मिला पत्रकार को
मिलीभगत हुई, लड़ाई टूटी
पर दोनो की इस मारामारी में
जनता की किस्मत फूटी।
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/05/blog-post_15.html
Ram and Ravan :
http://poetry.com/dotnet/P7382407/999/34/display.aspx
मत फेंको जूता
यह है शिष्टाचार के खिलाफ़
और कानून के विरुद्ध ।
तुम क्षमा कर दो उन्हे
जो हत्या में लिप्त थे
जरा देखो तो सही !
उनके हाथ अब कितने पाक-साफ है !
वे गले में टांगे घूम हैं
निर्दोष होने का प्रमाण-पत्र !
जरा समझो कि
साँस छोड़ती चन्द जिन्दगियां
धन्य हुई
जिनसे चील कौओं ने तुष्टि पाई;
फड़फड़ाती अकुलाती चिड़ियों की वेदना
धन्य हुई
जिनसे गलत में ही सही
प्रतिशोध की हवस पूरी की
बाज ने और गिद्धों ने
जिनके क्रूर नृत्य से डरता है आकाश
तो तुम सह लो और भूल जाओ
क्योंकि तुम्हारे अपनों की याद
मुँह चिढ़ाती है
आइने में नपुंसकता बन कर
इनके ठाठ-बाठ में शरीक हो जाओ
कि ये तुम्हे क्षमा करके पौरुषवान हो गये
फिर से कहता हूँ
मत फेंको जूता
अब तुमने फेंक ही दिया
तो तुम्हारे फटे मौजे के छेद से
नासूर दिखने लगे
जिसकी पीड़ा
कलम बेच खाने वालों को भी हुई
कहने लगे – तुम्हे
कलम की ताकत पर
भरोसा नहीं रहा
उसकी शक्ति हार गई जूते के आगे
तुम्हारे दर्द ने
व्यवस्था पर
जो आक्रमण किया
वही तो किया था
चील कौओं की राजनीति ने
बाज और गिद्धों के स्वार्थ ने
फ़र्क ही क्या रहा?
तो इस सभ्य समाज की
सारी खुशफ़हमियाँ
बनी रहने दो;
चुनाव के रोज
इठलाती उंगली पर लगी
इतराती हुई काली-
स्याही की कसम
मत फेंको जूता !
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/04/blog-post_17.html
http://hariharjha.wordpress.com/
भनक पड़े झरती बूंदों की खिड़की बन्द किया करता
कलरव पंछी का सुन कर भी कितना बोर हुआ जाता हूँ
रिसने लगे पलक से आँसू फूल पत्तियां देख देख
शिकायत भँवरों की गुंजन से लयभंग की मीनमेख
छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया
डूब गया नोटों में खड़ी कर दी आट्टालिकायें
जिस्म कैद हथकड़ी बजाता चिल्ला कर गाता हूँ
धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने
हुआ अनमना, एकाकी बोझिल दिमाग अपना ढ़ोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता
नृत्य हो रहा महफिल में मैं दिवास्वप्न में खोया
झनझन डूब गई सिक्कों की खनखन मैं पाता हूँ
हो गई है सुनसान डगर थक चला हूँ सब कुछ हारे
है धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे
सूख गया अनुराग ह्दय से बिन बसन्त का मेरा मन
सूरज से गीरता लावा करता महलों का ध्वंस दनादन
हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/02/blog-post_20.html
Eyes Dripping Tears
http://hariharjha.wordpress.com/2007/12/03/eyes-dripping-tears/
सामने खड़ी अनुज की मौत !
वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों
जो मांस नोचना जानते हैं
मानवता उन्हे कैसे समझाई जाय !
मेरा भाई ! नाज़ है उस पर !
स्वप्न और दूरद्रष्टि
उसके प्रोजेक्ट की लाल पीली रेखा बन कर
घूमते हैं उसके सिर में
बहुत प्यारा है वह
उसका सिर भी न !
किसी लेपटोप की भाँति
जिसमें ऐसी ऐसी नाड़ियां हैं
जिनकी छाया मात्र है
उस होटल ताज की सुन्दरता
जहाँ भाई, मेरा भाई ठहरा है
मिलने की गुदगुदी है इस मन की झोपड़ी में ।
फोन करता है वह मुझे
तो यह क्या? धम !धम ! गोलियों की आवाजें?
हाय ! बचाओ कोई उसे ! बचाओ !!
होटल मेनेजर की चेतावनी
उसके इंटरकोम से
पड़ रही मेरे भी कानों में
“कुछ प्रेतात्मायें घुस आई हैं होटल में
बिना भाड़ा दिये
मचल रही हैं तुम्हे मरघट ले जाने
बिना कसूर !
सुरक्षा की व्यवस्था गुड़गोबर !
अगला आदेश मिलने तक कछुये की तरह
अपनी इंद्रियों को ढंक लो कवर में
कमरे में लॉक कर लो अपने आपको
बाहर गीदड़ हो गये हैं आदमखोर
रक्तपान के लिये
झूम रहे चहुँओर” ।
बरामदे में शायद
राक्षस निगल रहे हड्डियों के टुकड़े
क्रुर पंजों से फैंक रहे हैं धधकती आग
क्षितिज पर फैली श्यामलता
न जाने यह कैसा बवंडर होगा
छटपटाती होगी उसकी नन्ही सी जान
निकल भागने के लिये
चंगुल से
लो खून से सन गई उसकी लाल रेखायें
और भयग्रस्त हुई पीली रेखायें
क्या सम्भाले? लेपटाप? दो कोड़ी का
पाकिट या महत्वपूर्ण कागज़ ?
जब कि दाग रहे वे परलोक के पासपोर्ट
और लाशें जमीन पर !
मेरा भाई ! कहाँ दफन करूँ इन आँसुओं को
चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यू
कैसे छुड़ाऊँ ?
चिंघाड़ रहा हूँ दर्द से
कहने को हिम्मत दे रहा उसे
पर खुद ही डरा हुआ
ढांढस क्या दूं ?
खुद ही मरा हुआ
छुप कर आजा ! इन्टरनेट के तारों में
रातभर फोन करता हूँ
बार बार
दिल में धकधक..
वहाँ पर वह मौजूद है
या…..
-हरिहर झा
http://kavita.hindyugm.com/2009/02/blog-post_06.html
Read “Cheers or Jeers”
http://boloji.com/poetry/4501-5000/4507.htm
रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।
-हरिहर झा
pleasure or pain?
http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm
http://hariharjha.wordpress.com/2008/03/31/pleasure-or-pain/
मुग्ध हो कर देख रहा हूं
और बह रहा हूं
अस्तित्व की बाढ़ में
तेरी अविजित मुस्कान
इधर झनझनाती तंत्रियों में शुरू
सामूहिक गान
तू झुलसा रही मेरे अहं को
उमड़ रहा न जाने क्या
झुकती नज़र, कभी उठती नज़र
पर इसके माने क्या ?
फुलवारी कुछ सिमट गई है
और थोड़ी-सी आहट से
कांपने लगी है
तूफ़ान के अंदेशे ने
क्या क्या जुर्म किये
मजबूर हो गया
खुद को सहने के लिये
क्योंकि बिच्छू ने मारा डंक
पावक चेतना पर
एक एक क्षण का बोझ
वाचाल तन-मन
पर जिव्हा ने एक न कही
नीरवता खाये जा रही
क्योंकि हिमालय खड़ा अपनी जगह
और गगन अपनी जगह
अव्यक्त भाव
मैं पिंजरे में बंद पक्षी
देख रहा हूं क्षितिज की ओर !
-हरिहर झा
*Published in “Hidden Treasure” a bilingual anthology by Melbourne Poets Association