हरिहर झा

June 22, 2009

हठयोग

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:23 am
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बेतुका है जीवन
अज्ञान के घुप्प अंधेरे में
व्यवस्था भी ऐसी कि
हड्डियों के ढेर पर फिसलते
मांस के लोथड़ से लिपटे
दिल की
धड़कन धक धक
साँसों का बवन्डर…
पूरे चिन्तन-यन्त्र को
पोल-पोट की आत्मा
नारियल के गोले बना कर
जमीन में गाड़ती
बचने की कोशीश में
भागती कोशिकायें और धमनियां
मैं हैरान हूँ
हवा लफ़ंगे की तरह झूम रही
अन्दर से बाहर
बाहर से अन्दर
भीतर मैली चदरिया से ढंका एक सिद्ध
जिसने गिरवी रखा है अपना ज्योतिपुंज
अब सूरज के ताप में जल भुन कर
कभी धुआँधार वर्षा से भीग कर
वृत्तियों के कीड़े मकोड़े नोच कर
निचोड़ रहा अपना जीवन
फिर भी प्रतिफल उसका लटकता
चिमगादड़ की तरह
रह रह कर भीतर से
स्वार्थी कुत्ता भौंकता
हाय ! घिन्न आती है
उस दिव्य मंजिल की राह में भी
क्यों होती है
ऐसी डरावनी माया
तो कभी
मरघट की
शांति वाली छाया
शंका चुभने लगी है -
कुण्डलिनी-जागरण
कहीं छलावा तो नहीं !

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/04/blog-post_03.html

Eyes Dripping Tears
http://hariharjha.wordpress.com/2007/12/03/eyes-dripping-tears/

June 11, 2009

मत फेंको जूता

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:51 am

मत फेंको जूता
यह है शिष्टाचार के खिलाफ़
और कानून के विरुद्ध ।

तुम क्षमा कर दो उन्हे
जो हत्या में लिप्त थे
जरा देखो तो सही !
उनके हाथ अब कितने पाक-साफ है !
वे गले में टांगे घूम हैं
निर्दोष होने का प्रमाण-पत्र !

जरा समझो कि
साँस छोड़ती चन्द जिन्दगियां
धन्य हुई
जिनसे चील कौओं ने तुष्टि पाई;
फड़फड़ाती अकुलाती चिड़ियों की वेदना
धन्य हुई
जिनसे गलत में ही सही
प्रतिशोध की हवस पूरी की
बाज ने और गिद्धों ने
जिनके क्रूर नृत्य से डरता है आकाश
तो तुम सह लो और भूल जाओ
क्योंकि तुम्हारे अपनों की याद
मुँह चिढ़ाती है
आइने में नपुंसकता बन कर
इनके ठाठ-बाठ में शरीक हो जाओ
कि ये तुम्हे क्षमा करके पौरुषवान हो गये
फिर से कहता हूँ
मत फेंको जूता

अब तुमने फेंक ही दिया
तो तुम्हारे फटे मौजे के छेद से
नासूर दिखने लगे
जिसकी पीड़ा
कलम बेच खाने वालों को भी हुई
कहने लगे – तुम्हे
कलम की ताकत पर
भरोसा नहीं रहा
उसकी शक्ति हार गई जूते के आगे
तुम्हारे दर्द ने
व्यवस्था पर
जो आक्रमण किया
वही तो किया था
चील कौओं की राजनीति ने
बाज और गिद्धों के स्वार्थ ने
फ़र्क ही क्या रहा?

तो इस सभ्य समाज की
सारी खुशफ़हमियाँ
बनी रहने दो;
चुनाव के रोज
इठलाती उंगली पर लगी
इतराती हुई काली-
स्याही की कसम
मत फेंको जूता !

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/04/blog-post_17.html

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May 15, 2009

खिड़की बन्द

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:26 am

भनक पड़े झरती बूंदों की खिड़की बन्द किया करता
कलरव पंछी का सुन कर भी कितना बोर हुआ जाता हूँ

रिसने लगे पलक से आँसू फूल पत्तियां देख देख
शिकायत भँवरों की गुंजन से लयभंग की मीनमेख
छ्टा निराली छोड़ के नकली चित्रों से मन बहलाया
झूला छोड़ महकती डाली डालर गिनना मुझको भाया

डूब गया नोटों में खड़ी कर दी आट्टालिकायें
जिस्म कैद हथकड़ी बजाता चिल्ला कर गाता हूँ

धूल इकठ्ठी की जीवन में कंकर बस हमने बीने
देख न पाया चांदनी के मृदुल अधर रस भीने 
हुआ अनमना, एकाकी बोझिल दिमाग अपना ढ़ोता
कल्पवृक्ष की छाया में भी मृगतृष्णा ही रहा संजोता

नृत्य हो रहा महफिल में मैं दिवास्वप्न में खोया
झनझन डूब गई सिक्कों की खनखन मैं पाता हूँ

हो गई है सुनसान डगर थक चला हूँ सब कुछ हारे
है धुंधलाया आकाश धरा बोझिल है गम के मारे
सूख गया अनुराग ह्दय से बिन बसन्त का मेरा मन
सूरज से गीरता लावा करता महलों का ध्वंस दनादन

हुये तमाशाई तारे दिखलाते दिन में नाटक
भीतर झांक के देखूं जितना गहन तमस पाता हूँ

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/02/blog-post_20.html

Eyes Dripping Tears

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April 28, 2009

आतंक

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 1:09 am
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सामने खड़ी अनुज की मौत !
वह भी कुछ कायर लोगों के हाथों
जो मांस नोचना जानते हैं
मानवता उन्हे कैसे समझाई जाय !
मेरा भाई ! नाज़ है उस पर !
स्वप्न और दूरद्रष्टि
उसके प्रोजेक्ट की लाल पीली रेखा बन कर
घूमते हैं उसके सिर में
बहुत प्यारा है वह
उसका सिर भी न !
किसी लेपटोप की भाँति
जिसमें ऐसी ऐसी नाड़ियां हैं
जिनकी छाया मात्र है
उस होटल ताज की सुन्दरता
जहाँ भाई, मेरा भाई ठहरा है
मिलने की गुदगुदी है इस मन की झोपड़ी में ।

फोन करता है वह मुझे
तो यह क्या? धम !धम ! गोलियों की आवाजें?
हाय ! बचाओ कोई उसे ! बचाओ !!
होटल मेनेजर की चेतावनी
उसके इंटरकोम से
पड़ रही मेरे भी कानों में
“कुछ प्रेतात्मायें घुस आई हैं होटल में
बिना भाड़ा दिये
मचल रही हैं तुम्हे मरघट ले जाने
बिना कसूर !
सुरक्षा की व्यवस्था गुड़गोबर !
अगला आदेश मिलने तक कछुये की तरह
अपनी इंद्रियों को ढंक लो कवर में
कमरे में लॉक कर लो अपने आपको
बाहर गीदड़ हो गये हैं आदमखोर
रक्तपान के लिये
झूम रहे चहुँओर” ।

बरामदे में शायद
राक्षस निगल रहे हड्डियों के टुकड़े
क्रुर पंजों से फैंक रहे हैं धधकती आग
क्षितिज पर फैली श्यामलता
न जाने यह कैसा बवंडर होगा
छटपटाती होगी उसकी नन्ही सी जान
निकल भागने के लिये
चंगुल से
लो खून से सन गई उसकी लाल रेखायें
और भयग्रस्त हुई पीली रेखायें
क्या सम्भाले? लेपटाप? दो कोड़ी का
पाकिट या महत्वपूर्ण कागज़ ?
जब कि दाग रहे वे परलोक के पासपोर्ट
और लाशें जमीन पर !
मेरा भाई ! कहाँ दफन करूँ इन आँसुओं को
चक्रव्यूह में फँसा अभिमन्यू
कैसे छुड़ाऊँ ?
चिंघाड़ रहा हूँ दर्द से
कहने को हिम्मत दे रहा उसे
पर खुद ही डरा हुआ
ढांढस क्या दूं ?
खुद ही मरा हुआ
छुप कर आजा ! इन्टरनेट के तारों में
रातभर फोन करता हूँ
बार बार
दिल में धकधक..
वहाँ पर वह मौजूद है
या…..

       -हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/02/blog-post_06.html

Read “Cheers or Jeers”

http://boloji.com/poetry/4501-5000/4507.htm

April 15, 2009

प्यार गंगा की धार

Filed under: काव्यालय, गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:02 am
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रजनी जग को सुलाये
सहे तिमिर का वार
नभ खुश हो पहनाये
चांद-तारों का हार
बन के खुद आइना रहा रूप को निखार
प्यार गंगा की धार

    
भूख सह कर भी मां
दर्द से जार-जार
तृप्त कर दे शिशु को
कैसी खुश हो अपार
भर के बांहों में वह करे असुंवन संचार
प्यार गंगा की धार

  
भक्त सहते गये
दुष्ट दैत्यों की मार
किया जगजननी ने
राक्षसों पर प्रहार
माँ की लीला कहे करुणा जीवन का सार
प्यार गंगा की धार

     
प्रकृति मां का रूप
झेले जगति का भार
लालची नर करे
दासी जैसा व्यवहार
छेद ना कर मूरख जबकि नैया मंझदार
प्यार गंगा की धार

    
क्रोध मद लोभ से
हुआ जीवन दुष्वार
काम से निकला प्रेम -
पुष्प के रस का तार
बांध कर ले गया स्वार्थ-लिप्सा के पार
प्यार गंगा की धार।

        -हरिहर झा

pleasure or pain?

http://boloji.com/poetry/4001-4500/4085.htm 

http://hariharjha.wordpress.com/2008/03/31/pleasure-or-pain/

April 3, 2009

मुग्ध हो कर

Filed under: अतुकांत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:48 am

मुग्ध हो कर देख रहा हूं
और बह रहा हूं
अस्तित्व की बाढ़ में
तेरी अविजित मुस्कान
इधर झनझनाती तंत्रियों में शुरू
सामूहिक गान

तू झुलसा रही मेरे अहं को
उमड़ रहा न जाने क्या
झुकती नज़र, कभी उठती नज़र
पर इसके माने क्या ?

फुलवारी कुछ सिमट गई है
और थोड़ी-सी आहट से
कांपने लगी है
तूफ़ान के अंदेशे ने
क्या क्या जुर्म किये
मजबूर हो गया
खुद को सहने के लिये
क्योंकि बिच्छू ने मारा डंक
पावक चेतना पर
एक एक क्षण का बोझ
वाचाल तन-मन
पर जिव्हा ने एक न कही
नीरवता खाये जा रही
क्योंकि हिमालय खड़ा अपनी जगह
और गगन अपनी जगह
अव्यक्त भाव
मैं पिंजरे में बंद पक्षी
देख रहा हूं क्षितिज की ओर !

-हरिहर झा

*Published in “Hidden Treasure” bilingual  anthology  by Melbourne Poets Association

March 20, 2009

मौत का एहसास

Filed under: गीत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:43 am
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मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

धमनियां फैली शीरा में
काल की गुर्राहटें भी
देह बुनता लाल चादर
राख में हैं सलवटें भी
फिर दिखी फूलों की माला
डालती सांसों पे ताला

फिसलने लगी जीजिविषा
लो चरमराती हड्डियों पर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

फलसफा अपना बनाकर
भीड़ को सौंपे जो नारे
सृष्टि अपनी ही रची
मैंने बनाये चाँद तारे
ढह गई फिर से दीवारें
हिल उठे वे खंडहर भी
धमाके से स्वर्ग आई
जल चुकी जो लाश चलकर
मौत का एहसास पलपल
देह में अनुनाद कलकल

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/01/blog-post_02.html

For “My death” click on :

http://boloji.com/writers/hariharraijha.htm

http://boloji.com/poetry/2701-2800/2721.htm

March 11, 2009

अभागी मैं

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 am
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मुझे अपना जैसा बनाने के नाम पर
मेरा स्वत्व छिन कर ले गये
बेडि़यां उतारने के बहाने
कुछ नई बेडियां जोड़ गये
भोली मैं
अपनी खुशी की दुनियां में
फुदकती रही चहकती रही
अपने केशों को मर्दों की तरह
छोटा कर
जीती रही एक छलावा
पुरूषाये वस्त्र पहन कर
देती रही अपने को
एक भुलावा

भूल गई
घर के साथ दोहरा शोषण
हो रहा आफिस के काम पर
तडा़क सा किया तलाकित
अधिकार देने के नाम पर
ताकि तुम मुझे
सिंगल मदर या
अविवाहित मा के रूप में
छोड़ कर
मुझसे अपनी नजर मुड़ा सको
नन्हा गुल मुझे सौप कर
गुलछर्रे उड़ा सको।

मैं जिन्दा थी
केवल रिश्तों के नाम पर
फूल पत्तियों से लदी
अपनी जड़ से विहिन
पर व्यक्तित्व देने के बहाने
नोचते रहे पत्तियों को मेरी शाखों से
चिपकाते रहे
ब्यूटीसेलुन के लोशन से
नकली फुल मेरी देह पर
प्रतियोगी मापदंड बना कर
निहारते रहे अपनी आंखो से।

वस्त्रों के आवरण पर आवरण
मुझे ओढ़ा दिये थे
स्वामी होने की भावना से
आदिम पुरूष ने
कि कोई मुझे
झपट न ले
बनाये थे काराग्रह मेरे चारो और
मै नाईटक्लब की बाला सी
देखती रह गई
जब तुमने एक एक भारी आवरण को उतार कर
मुझे हल्का किया बादलों सा
पर उतारते उतारते
यह क्या किया तुमने
उतार ली मेरी चमड़ी तक
कभी फेशन के नाम पर
कभी स्वतन्त्रता के नाम पर
और अभागी मै
वस्तु थी
बच्चे की पैदाईश के लिये
वस्तु रह गई
दुनियां की नुमाइश के लिये।

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/01/blog-post_6976.html

Let Them Blossom

http://boloji.com/poetry/3001-3100/3061.htm

February 25, 2009

बाजार-भाव

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 3:33 am

यौवन के घनेरे बालों की खुशबू

तिस पर ऐसा मोहक अनुरोध

अनमोल है यह  पल

इस निराले उन्माद में

यह रूठना मनाना

नाजुक कलाई  से  उभरता प्यार

कल भले ही मरघट की

सीढ़ियों पर चढ़ कर

गुमनाम हो जाय

उल्का की तरह चमक कर

विलुप्त हो जाय

न जाने कब धूल-धुसरित कर दें

काल के धागों में गुंथे अलगाव;  

कला से ढांपे हुये  जिस्म

रूह को बाजारी बना दें

गुणवत्ता के मापतोल

दूकानों पर मिलते कमिशन

लचीली शर्तें

मोहक विज्ञापन के  जादू 

बाजार-भाव के एहसास

लाभ की

मनोवृत्ति से उफनती आँच

न जाने कब

इस क्षण के घरौंदे को

लपेट कर

सब कुछ निगल जाय !

 

    -हरिहर झा

  http://kavita.hindyugm.com/2008/11/blog-post_07.html 

 Your Look!

http://hariharjha.wordpress.com/2009/01/21/your-look/

 

http://hariharjha.wordpress.com/

 

 

 

 

 

February 2, 2009

मेरे उसूल

Filed under: अतुकांत, हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:50 am

मैं प्रोफेसर

मेरे कुछ उसूल हैं

भले हो  विद्यार्थिनी

कुछ पक्षपात नहीं करता

मेरे घर का दरवाजा

पढ़ने के लिये कौन खटखटाता

इसका एहसास नहीं होता मुझे

ढँक लेता कोहरे में

उसकी शारीरिक-संरचना

मैं लहरों की कगार पर खड़ा

नहीं देखता  उफनती नदी

बगिया की 

पंखुड़ी अपनी अल्हड़ अदा में

भले ही खिल रही हो

बाँहे फैला कर नहीं तलाशता मैं

प्रेम की फुहार;

नहीं महसुसता

आंचल से प्रस्फुटित प्रेम

भले हों किसी की बाहों में भटकती

हजारों तमन्नायें

नही सिमटता उसमें

 खेल रही हो अठखेलियां

तो नहीं  देखता मैं  गर्दन उचकाये

नहीं बुझाता अपनी प्यास

 यह सिद्धान्त ही मेरा संयम

http://kavita.hindyugm.com/2008/12/blog-post_1818.html

Your Look :

http://hariharjha.wordpress.com/2009/01/21/your-look/

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