हरिहर झा

जनवरी 4, 2012

त्योहार

Filed under: Uncategorized — by Harihar Jha हरिहर झा @ 2:50 पूर्वाह्न
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सद्भावना का इत्र सुगंधित इस फूल के हार में
रिमझिम बरस रही फुहार का , आनन्द त्योहार में

हार गई है रुदन-रागिनी मुस्काने झेल रही
सब के चेहरों पर हँसी की , फुलझड़ियां खेल रही

किरण निकली इन्द्रधनुष सी बादल से छन छन के
उजियारा लो फैल गया है गलियारे में मन के

चांदनी धरती पर दूध के सागर में नहा गई
साकीबाला छाई सजधज मधुशाला बहा गई

-हरिहर झा

नवम्बर 4, 2011

मनवा क्यों नाच रहा

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:36 पूर्वाह्न
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खून शहर का निसार
सपनों की लाली पर
मनवा क्यों नाच रहा
शीशे की थाली पर

दारू की बोतल में
जिजीविषा हार गई
फड़फड़ है घायल तन
नाजुक मन मार गई
लुटा गई जिस्म यहाँ
भँवरे की गाली पर

’हाँसिल हो’ ये बुखार
जीते हैं मरते हैं
भूतों के अड्डों में
अट्टहास करते हैं
महलों के ख़्वाब चले
जगते हैं ताली पर

निबटाते काम-काज
थक कर यों चूर हुये
सुस्ताते, सोच रहे
घर से क्यों दूर हुये
मछली से आन फँसे
सिक्कों की जाली पर

- हरिहर झा

नवगीत की पाठशाला से साभार :

http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2011/07/blog-post_25.html

Pleasure or Pain?

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=2802

 

 

सितम्बर 27, 2011

पलाश के प्रति

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 5:54 पूर्वाह्न
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तुझ में आग
देखी, लगी मुझमें आग
लिये अपने अपने भाग
चल तो पड़े, मुश्किल बड़ी।

वन में तू
हिमकणों की, शीतल अग्नि !
तप रहा मैं,
गरमा रहा
तू इस तरह, मुस्का रहा
लगे दुल्हन,
दमकती यह लाल आभा
लगता है कि, शरमा रहा

रंगरेज ने तोहे का
कीन्हो लाल
लहू मेरा , क्रोध से लाल
तू तृप्त है, मैं बेहाल
मेरे गले आफ़त पड़ी।

नफ़रत लिये,
सारे जहाँ को, लूट लूँ मैं
चाह ऐसी छटपटाती
महक तेरी
विश्व भर में, प्यार देती
भव्य आभा कौंध जाती

धन्य बिजली !
धमनियों की त्रस्त बिजली
हा निगोड़ी पापिन जली
बेचैन मन दुख की कड़ी।

-हरिहर झा

I am Silent

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=1491

अगस्त 25, 2011

सपने में जो देखा

Filed under: अनुभूति,गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:51 पूर्वाह्न
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कुदरत का यह लेखा
सपने में जो देखा
सुबह वही तो समाचार है

ताक-झाँक की थी पड़ोस में
’विकिलिक्स’ अखबार में छाये
टपकी लार बनी ईंधन तो
भट्टी खुद ही जलती जाये

लावा बहे दनादन
रीता घट रोता मन
छपी खबर का यही सार है

गाली मन में दबी पड़ी थी
गोली बन कर निकल पड़ी है
ख़्वाबों में जो लाश बिछाई
मौत सामने तनी खड़ी है

दिवास्वप्न तो दूर
अंतस् का दर्पण चूर
भीतर गहरा अंधकार है |

-हरिहर झा
“नवगीत की पाठशाला” से साभार :

http://navgeetkipathshala.blogspot.com/2011/04/blog-post_19.html

Cheers or Jeers

http://www.boloji.com/index.cfm?md=Content&sd=Poem&PoemID=446

जुलाई 25, 2011

धीरे धीरे

Filed under: शेर — by Harihar Jha हरिहर झा @ 6:05 पूर्वाह्न

मौत हम पर,  छायेगी धीरे धीरे
गोश्त डायन खाएगी धीरे धीरे

सांस दर्दों में क्यों कर आहे भरती
टूट कर भी,  गाएगी धीरे धीरे

रूठ के चल दी जाने किस कोने में
जा के वापस आएगी धीरे धीरे

लाज ना आये पल्लू में मुस्काती
तर्ज मेरी  भाएगी धीरे धीरे

ये अदायें  फैंको संभल कर वर्ना  
रंग छोड़े      जाएगी धीरे धीरे।

                           -हरिहर झा

मई 20, 2011

आँसुओं ! बह जाओ तो अच्छा रहे

Filed under: गीत — by Harihar Jha हरिहर झा @ 12:55 पूर्वाह्न
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बाढ़ ! पलकों पर रूकी कब तक रहोगी?
आँसुओं ! बह जाओ तो अच्छा रहे

क्या पता इक मधुर सी हँसी मिल गई तो
रोक लेगी पलक के ही  कोर पर
यन्त्रणा के यन्त्र में घिर कर रहोगी   
स्नायुओं के दूर पतले छोर पर

मौत के कीड़े जहाँ पर चुलबुलाते
निकल भागो  जल्द तो अच्छा रहे

सुनामियों का ज्वार हो ललाट पर
गुरू-वृन्द को सकून ना आ जाय जब तक
फफोलों में दर्द का लावा पिलाती
हाकिमों को चैन ना आ जाय जब तक

फैंक दो ये सब दवा लुभावनी
मीठी छुरी ललचायें ना अच्छा रहे।

दैत्य पीड़ा दे अगर हँसते रहे
क्या सिमट कर तुम कलपती ही रहोगी
शिष्ट मर्यादा तुम्हे रोकें बहुत
घुटन में रूक कर तड़पती ही रहोगी !

तोड़ निकलो शरम के कुछ डोर यह 
सुधि वस्त्र की उलझाये ना अच्छा रहे

                        -हरिहर झा

जनवरी 27, 2011

खिलखिलाये

Filed under: गीत,मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:52 पूर्वाह्न

शोक में, उल्लास में
दो बूंद आँसू झिलमिलाये
देखकर प्यासे सुमन पगला गये और खिलखिलाये
*
साज़िश थी इक ,
सूर्य को बन्दी बनाने के लिये
जंजीर में की कैद किरणे
तमस लाने के लिये
नादान मेढक हुये आगे, राह इंगित कर रहे
कौशिशों में जूगनुओं ने चमक़ दी और पर हिलाये
देखकर नन्हे शिशु पगला गये और खिलखिलाये
*
बाद्लों के पार
बेचैनी भरी मदहोंश चितवन
देख सुन्दर सृष्टि को ना
रोक पाई दिल की धड़कन
भाव व्याकुल हो तड़ित सा काँप जाता तन बदन
मधुर आमन्त्रण दिये, निशब्द होठों को हिलाये
देखकर रूठे सनम पगला गये और खिलखिलाये
*
नृत्य काली रात में था
शरारत के मोड़ पर
सुर बिखरता , फैल जाता
ताल लय को तोड़ कर
छू गया अंतस
प्रणय का गीत मुखरित हो उठा
थम गई साँसे उलझ कर जाम लब से यों पिलाये
देखकर प्यासे चषक पगला गये और खिलखिलाए

-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2011/01/blog-post_07.html

अगस्त 13, 2010

बुलन्द आवाज

Filed under: अतुकांत,आखर कलश — by Harihar Jha हरिहर झा @ 9:38 पूर्वाह्न
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चिढ़ाने का सा भाव
सपनीली आँखों से
देख कर
मैं अपने को पाता हूँ
आधा अधूरा
यह खालीपन …
जाने क्यों ?
ढूढंता हूँ
कुछ पाने के लिये
पर हाथ बढ़ा कर भी
रोक नहीं पाता
फिसलते क्षण;
विरान दिल को
डूबा देती हो अथाह सागर में
तुम्हारे धनुष-बाण घुस आते हैं -
दिल-दिमाग की तंत्रियां झंझोड़ कर
नग्न विचारों को एक झटका देकर
अनकहे भावों की बखिया उधेड़ कर
दे देती हो
एक तिनके का सहारा
जिसका आशय समझ नहीं पाता
मौन वार्ता सुन नहीं पाता
कुछ जान नहीं पाता
सिवा इसके कि -
आकाश से दुधिया चांदनी
जब रिसती हुई गीरती है
धरती के दामन पर
तो यह मदमस्ती बरगलाती
प्रलोभन देती
इसकी लहलहाती फसल
थामे हुये जो तुम खड़ी हो
यह तुम्हारे जिस्म से निकलती
बुलन्द आवाज है
रूह से निकलता
संगीत है

-हरिहर झा
http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

http://hariharjha.wordpress.com/

जून 15, 2010

नाटक

Filed under: अतुकांत,आखर कलश — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:07 पूर्वाह्न
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समन्दर पार कंटीली झाड़ी के पीछे
झोपड़ी के आंगन में
भले सताती चिन्तायें और बढ़ती धड़कन
पर जहां मिलती थी
प्रेम की सौगात
चाहता तो ले लेता
हँसते हुये
लेकिन ठहराव से विद्रोह कर के
यहां तो फंस गया दुविधा में
धुंधलाई शाम में बीयर की बोतल खुलने पर
चांद ने
जब अंधियारे को चूमा
तो मेरी शान से सजाई हुई
बत्तियों को
अस्तित्व का खतरा नजर आया
मैंने मुँह बिचका लिया
तन गई एक एक नस
जिसकी थकान ही
लिख डालती सलवटें बिस्तर पर ।

जागते हुये देख रहा हूँ सपना कि
नींद नहीं आती डालर के नोटो पर
कितनी अच्छी थी बाजरे की रोटी
सरसों का साग
अब यहां पर
हर मुस्कान शिष्टाचार के विरुद्ध है
और खुश होने का अर्थ
देशद्रोह , एक घमन्ड, एक पाखन्ड
जो कविता की आत्मा के खिलाफ है
तो भीगो ले अपने तकिये
स्वार्थ पर प्रेम की और
देह पर आत्मा की जीत के लिये
भोग पर अध्यात्म की जीत के लिये
रोना न आये तो रो ले
ग्लीसरीन लगा कर !
समझ ले !
टपकते आँसू एक संस्कृति है ।
*******
http://aakharkalash.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html

Folly of the wisdom

http://hariharjha.wordpress.com/2007/11/08/folly-of-the-wisdom/

नवम्बर 9, 2009

रोना चाहता है

Filed under: मंच,हिन्द-युग्म — by Harihar Jha हरिहर झा @ 4:26 पूर्वाह्न
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गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है
ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है

ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब
बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है

कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर
तेज जलता चिराग अब बुझना चाहता है

लुट गई तो न बच सकेगी धरती पे कहीँ
आबरू को डूबाके वो मरना चाहता है

हँस न पाया हँसी कभी मासूम सी जो
भटक कर फूल वो कहाँ बोना चाहता है

चाँद पर रात भर यों काला डामर टपकता
पाप धरती से जो हुये ; धोना चाहता है
-हरिहर झा

http://kavita.hindyugm.com/2009/07/blog-post_17.html

her teasing face

http://hariharjha.wordpress.com/2008/09/15/her-teasing-face/

 

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